ATS रिपोर्टर देवेन्द्र कुमार जैन भोपाल मध्य प्रदेश
भोपाल जिले में पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ कृषि पद्धतियों और ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए नरवाई प्रबंधन, जैविक खेती तथा स्वामित्व योजना के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया जा रहा है। नरवाई नहीं जलाने, फसल अवशेषों से जैविक खाद तैयार करने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए किसानों को जागरूक करना आवश्यक है। वहीं, स्वामित्व योजना के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को उनकी आवासीय संपत्ति के दस्तावेजी अधिकार उपलब्ध कराने तथा ग्राम पंचायतों की विकास योजनाओं को मजबूत बनाने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। नरवाई जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण की रोकथाम तथा किसानों को पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में कलेक्टर प्रियंक मिश्रा की अध्यक्षता में किसान संगठनों के पदाधिकारियों के साथ बैठक आयोजित की गई। बैठक में फसल अवशेष जलाने से पर्यावरण और मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के साथ नरवाई प्रबंधन के वैकल्पिक उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। कलेक्टर ने किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से आह्वान किया कि वे गांवों में किसानों के बीच पहुंचकर नरवाई नहीं जलाने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं। उन्होंने फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन, आधुनिक कृषि उपकरणों के उपयोग और पूसा डीकंपोजर जैसे विकल्पों को अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। नरवाई का उचित प्रबंधन वायु प्रदूषण कम करने, मिट्टी में उपयोगी सूक्ष्मजीवों के संरक्षण और कृषि भूमि की दीर्घकालिक उत्पादकता बनाए रखने में सहायक है। नरवाई प्रबंधन के साथ जैविक खेती को बढ़ावा देना भी टिकाऊ कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। फसल अवशेषों, गोबर और अन्य जैविक पदार्थों से खाद तैयार कर उनका उचित उपयोग मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने तथा उसकी संरचना और उर्वरा शक्ति बनाए रखने में मदद कर सकता है। किसानों को जैविक खाद के निर्माण, फसल अवशेषों के उपयोग, फसल चक्र अपनाने और कृषि संसाधनों के संतुलित प्रबंधन के प्रति जागरूक किया जाना आवश्यक है। नरवाई को जलाने के बजाय खेत में उचित तरीके से मिलाने अथवा अन्य उपयोगी विधियों से उसका प्रबंधन करने पर मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ कृषि की दीर्घकालिक उत्पादकता को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। किसान संगठनों और ग्राम स्तर पर सक्रिय समूहों की सहभागिता से जैविक खेती के लाभों तथा व्यावहारिक कृषि तकनीकों की जानकारी अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचाई जा सकती है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त कृषि पद्धतियों को अपनाने से खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं।ग्रामीण परिवारों की आवासीय संपत्तियों का अभिलेखीकरण कर उन्हें स्वामित्व का दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा स्वामित्व योजना संचालित की जा रही है।24 अप्रैल 2020 को शुरू की गई इस योजना के अंतर्गत ड्रोन तकनीक से ग्रामीण आबादी क्षेत्रों का सर्वेक्षण कर संपत्ति अभिलेख तैयार किए जाते हैं तथा पात्र हितग्राहियों को प्रॉपर्टी कार्ड उपलब्ध कराए जाते हैं। प्रॉपर्टी कार्ड से ग्रामीणों को अपनी आवासीय संपत्ति के स्वामित्व संबंधी स्पष्टता और दस्तावेजी प्रमाण प्राप्त होता है। इससे संपत्ति विवादों को कम करने और अभिलेखों के व्यवस्थित रखरखाव में सहायता मिल सकती है। संबंधित नियमों और बैंक की पात्रता शर्तों के अधीन इन दस्तावेजों का उपयोग ऋण प्राप्त करने के लिए भी किया जा सकता है, जिससे ग्रामीण परिवारों को स्वरोजगार और छोटे व्यवसायों के लिए आर्थिक अवसर प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। स्वामित्व योजना के अंतर्गत तैयार डिजिटल मानचित्र और संपत्ति अभिलेख ग्राम पंचायतों को स्थानीय विकास कार्यों की योजना बनाने में सहायक होते हैं। व्यवस्थित रिकॉर्ड से संपत्तियों की पहचान, प्रशासनिक पारदर्शिता और नियमानुसार संपत्ति कर निर्धारण की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। इससे ग्राम पंचायतों को उपलब्ध संसाधनों का आकलन करने और विकास कार्यों की प्राथमिकताएं निर्धारित करने में भी सहायता मिलती है। भोपाल जिले में नरवाई प्रबंधन, जैविक खेती और स्वामित्व योजना जैसे प्रयास ग्रामीण विकास के विभिन्न पहलुओं को जोड़ते हैं। नरवाई का उचित प्रबंधन और जैविक खेती मिट्टी के स्वास्थ्य तथा पर्यावरण संरक्षण में सहायक हैं, जबकि स्वामित्व योजना ग्रामीण परिवारों को संपत्ति संबंधी दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध कराने और स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बनाने में मदद करती है। इन प्रयासों को प्रभावी बनाने के लिए जिला प्रशासन, किसान संगठनों, ग्राम पंचायतों और ग्रामीणों के बीच समन्वय तथा निरंतर जनजागरूकता आवश्यक है। सामूहिक सहभागिता से भोपाल जिले में पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहन देने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और ग्रामीण परिवारों के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।









