बिहार के गोपालगंज के 40 चयनित किसानों हेतु आयोजित तीन दिवसीय कृषक भ्रमण-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन।

बिहार के गोपालगंज के 40 चयनित किसानों हेतु आयोजित तीन दिवसीय कृषक भ्रमण-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन।

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त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट

प्रयागराज। बिहार के गोपालगंज के 40 चयनित किसानों हेतु आयोजित तीन दिवसीय कृषक भ्रमण-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन। सैम हिगिनबॉटम कृषि, प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय (शुआट्स ), प्रयागराज के प्रसार निदेशालय द्वारा आत्मा (ATMA) योजना के अंतर्गत बिहार राज्य के गोपालगंज जनपद के चयनित 40 किसानों के लिए आयोजित तीन दिवसीय कृषक भ्रमण-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन आज सफलतापूर्वक किया गया।

इस अवसर पर निदेशक प्रसार डॉ. प्रवीण चरण ने मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति (पीएमडी) प्रो. (डॉ.) रितु पी. दुबे को पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका स्वागत किया।
अपने संबोधन में मुख्य अतिथि ने वर्तमान कृषि परिदृश्य में समन्वित कृषि प्रणाली की बढ़ती उपयोगिता एवं महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्ष 2050 तक भारत में खाद्यान्न की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है, जिसके दृष्टिगत कृषि उत्पादकता एवं किसानों की आय बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कृषि निवेश की लागत लगातार बढ़ने के बावजूद किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है।

उन्होंने बताया कि समन्वित कृषि प्रणाली छोटे एवं सीमांत किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने का एक प्रभावी माध्यम है। कृषि विविधीकरण एवं पशुपालन आधारित गतिविधियों को अपनाकर किसान आर्थिक रूप से सशक्त बन सकते हैं। उन्होंने किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ अपनाने, खेती की लागत कम करने तथा जैविक खाद एवं जैव उर्वरकों के अधिकाधिक उपयोग के लिए प्रेरित किया। साथ ही, हानिकारक कृषि रसायनों के दुष्प्रभावों को कम करने तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार के लिए कम्पोस्ट युक्त गोबर की खाद एवं जैविक आदानों के उपयोग पर बल दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए निदेशक प्रसार डॉ. प्रवीण चरण ने समन्वित कृषि प्रणाली की उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि फसल उत्पादन, बागवानी, पशुपालन, फल एवं सब्जी उत्पादन, मधुमक्खी पालन तथा अन्य कृषि आधारित उद्यमों को एक साथ अपनाकर एक टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि मॉडल विकसित किया जा सकता है। ऐसी प्रणाली संसाधनों के कुशल उपयोग, उत्पादन क्षमता में वृद्धि, पर्यावरण संरक्षण तथा किसानों की आय को स्थिरता प्रदान करने में सहायक है। उन्होंने यह भी कहा कि वर्षा जल संचयन के माध्यम से किसान अपने खेतों में फसल आच्छादन बढ़ा सकते हैं तथा उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग कर अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं।

तकनीकी सत्र में वैज्ञानिक डॉ. राम पाल सिंह ने पशुपालन विषय पर चर्चा करते हुए पशुओं को संतुलित आहार देने की सलाह दी। उन्होंने पशुओं के आहार में दाना, चोकर, नमक, खनिज मिश्रण एवं हरे चारे की उचित मात्रा सुनिश्चित करने पर बल दिया। उन्होंने पशुओं के स्वास्थ्य एवं उत्पादकता के लिए पर्याप्त स्वच्छ पेयजल, नियमित टीकाकरण एवं कृमिनाशक उपचार के महत्व को रेखांकित किया। साथ ही, दुग्ध उत्पादन में स्वच्छता एवं उचित दुग्ध दोहन विधियों को अपनाने तथा खुरपका-मुंहपका (FMD) एवं गलाघोंटू (HS) जैसी बीमारियों से बचाव हेतु समय पर टीकाकरण कराने की सलाह दी। उन्होंने मुर्गियों के सामूहिक टीकाकरण एवं अनुशंसित रोग नियंत्रण उपायों को अपनाने का भी सुझाव दिया।

वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. टी. डी. मिश्रा ने किसानों को आलू की वैज्ञानिक खेती के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों एवं उपयुक्त मौसम को ध्यान में रखते हुए माह के मध्य से आलू की बुवाई प्रारंभ करने की सलाह दी। बीज शोधन हेतु उन्होंने डाइथेन एम-45 के 0.25 प्रतिशत घोल में आलू के बीजों को एक मिनट तक डुबोने तथा शोधन के बाद खेत में लगाने की जानकारी दी।

उन्होंने कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी बहार, कुफरी बादशाह, कुफरी बहारशाही, कुफरी सिंधुरी, कुफरी सतलुज, कुफरी आनंद, कुफरी ज्योति, कुफरी चिप्सोना-1 एवं कुफरी चिप्सोना-2 सहित विभिन्न आलू प्रजातियों के बारे में भी बताया। उन्होंने बुवाई के लगभग 10 दिन बाद पहली मिट्टी चढ़ाने तथा इसके 15 दिन बाद दूसरी बार मिट्टी चढ़ाने की सलाह दी। कीटों की रोकथाम के लिए 5 प्रतिशत एन.एस.के.ई. अथवा 3 प्रतिशत नीम तेल के अनुशंसित प्रयोग तथा फूलगोभी में यूरिया के संतुलित एवं अनुशंसित उपयोग के संबंध में भी जानकारी दी।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि एवं निदेशक प्रसार द्वारा कार्यक्रम में प्रतिभाग करने वाले किसानों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। उन्होंने तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता के लिए किसानों को बधाई दी तथा उनके उज्ज्वल भविष्य एवं कृषि कार्यों में सफलता की कामना की।

इस अवसर पर संयुक्त निदेशक प्रसार डॉ. ए. के. चौरसिया, वैज्ञानिक डॉ. शिशिर कुमार, डॉ. मनीष कुमार केसरवानी, डॉ. शैलेन्द्र कुमार सिंह सहित विश्वविद्यालय के अधिकारी, वैज्ञानिक, शिक्षक एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक कृषि तकनीकों, समन्वित कृषि प्रणाली तथा टिकाऊ आजीविका के अवसरों के संबंध में व्यावहारिक ज्ञान एवं प्रशिक्षण प्रदान कर उनकी कृषि संबंधी दक्षता एवं आय में वृद्धि को प्रोत्साहित करना था।

AT Samachar
Author: AT Samachar

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