आकाश आनंद ने बीएसपी को बीजेपी की बी-टीम बताए जाने के आरोपों को ख़ारिज किया।

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लेकिन चुनाव के बाद बीजेपी के साथ जाने की संभावना से जुड़े सवाल पर उन्होंने ये भी कहा कि बीएसपी का मक़सद राजनीतिक सत्ता में आना है. इसके लिए पार्टी जो सही होगा करेगी

लखनऊ, यूपी। आज बात करते हैं बसपा के नए क्लेवर में आगे बढ़ने के बारे में, अब आगे बढ़ना ही कहेंगे क्योंकि समय जैसे आगे बढ़ता है और किसी दल का नेतृत्व बदलता है तो दल भी आगे ही बढ़ने का प्रयास करता है। बसपा में मायावती चार बार मुख्यमंत्री रहीं जिसमें तीन बार बीजेपी के सहयोग से या गठबंधन से और एक बार अपने पूर्ण बहुमत से।

बहुजन समाज पार्टी 1984 में बनी और उसने सत्ता 9 साल बाद 1993 में प्राप्त किया, इन 9 सालो में बसपा ने एक मिशन के तहत बहुजन समाज को जगाने का काम किया, कासीराम और मायावती के साथ-साथ कई बहुजन नेताओं के नेतृत्व में इसका प्रतिफल रहा है कि बहुजन समाज पार्टी का एक काडर तैयार हुआ और बसपा चार बार उत्तर प्रदेश की सत्ता में रही।


आप ने गौर किया हो तो बसपा केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं उत्तर और दक्षिण भारत के प्रदेशों इसमें मध्य्प्रदेश , राजस्थान , दिल्ली , पंजाब , हरियाणा , उत्तराखंड , महाराष्ट्र , कर्णाटक , तेलंगाना में भी राजनीती को प्रभावित करती रही , लेकिन सत्ता केवल उत्तर प्रदेश में ही मिली।
सत्ता पाने के बाद बसपा से मायावती मुख्यमंत्री बनी और उन्होंने सबसे पहले मुख्यमंत्री होने के ताकत का एहसास आम आदमी को कराया, प्रशासनिक अधिकारी समय से अपनी ऑफिस आ ही आते थे और तय समय में जनता का काम करते थे। मायावती ने विकेन्द्रीकरण और शिक्षा पर बहुत ध्यान दिया, मायावती के कार्यकाल में 6 इंजीनियरिंग कॉलेज, 2 होम्योपैथिक कॉलेज, 24 पॉलिटेक्निक कॉलेज, 2 पेरामेडिकल कॉलेज, 6 विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय, 200 से अधिक इंटर व 200 से अधिक डिग्री कॉलेज, 572 हाईस्कूल, 5549 से अधिक प्राइमरी स्कुल, 100 से अधिक आईटीआई, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, भारत का एकमात्र ऐसा विश्विद्यालय जो अंतिम सत्र में विद्यार्थियों को अमेरिका, यूरोप,जैसे देशो में उच्च शिक्षा के लिए भेजता है।


मायावती ने परदेस में दस जिलों का और बहुत सी तहसीलों का निर्माण किया इससे जनता को बहुत राहत मिली और नए अधिकारिओं की न्युक्ति भी हुई। मायावती के कामों में इतने काम हैं इसका जिक्र इतने छोटे कार्यक्रम में नहीं किया जा सकता है। बसपा एक मिशन तो है ही साथ में बसपा सत्ता के माध्यम से ही बदलाव कर सकती है इसके लिए ही बसपा चुनाव लड़ती है। बसपा के नए उत्तराधिकारी आकाश आनंद ने साफ़ कर दिया कि बसपा का अंतिम लक्ष्य सत्ता पाना है , इससे बहुजन समाज का काम हो सकता है।


अब सत्ता को पाने के लिए समीकरण की बात करें तो बसपा का बेस वोट दलित समाज है , लेकिन मायावती सोशल इंजीनियरिंग करके सत्ता पाती रही हैं , 2012 विधानसभा चुनाव के बाद सोशल इंजीनियरिंग काम नहीं कर रही है , 2012 विधासनभा में बसपा की सरकार चली गयी तो 2014 लोकसभा चुनाव में खाता नहीं खुला , 2017 विधानसभा में लग रहा था बसपा की सरकार बन जाएगी , बसपा ने दलित मुस्लिम समीकरण के साथ सौ से जायदा प्रत्याशी मुस्लिम समाज से उतारे थे , यहाँ तक कि जहाँ सपा के मुस्लिम विधायक थे वहां भी बसपा ने अपने मुस्लिम प्रत्याशी उतार दिए। सपा का कांग्रेस से गठबंधन हो गया और यह बात उड़ा दी गयी की बसपा बीजेपी का समर्थन कर सकती है और बसपा सपा को हारने के लिए अधिक मुस्लिम प्रत्याशी उतारी है। हुआ क्या कि त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा को अपार बहुमत मिला और बसपा को केवल 19 विधायक ही मिल सके।


2019 लोकसभा चुनाव में बसपा ने सपा से गठबंधन किया , बसपा के दस सांसद जीते भी लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद बसपा ने यह कहकर गठबंधन तोड़ दिया कि सपा का वोट ट्रांसफर नहीं हुआ। अबकी बसपा दस लोकसभा की सीट जीती थी। आकाश आनंद के इस बयान से आ पता चला कि बसपा ने सपा के साथ गठबंधन क्यों तोडा था और बीजेपी से मिले होने का आरोप गलत नहीं प्रतीत होता है। इसके पीछे का कारण है कि भाजपा को लगा कि अगर सपा और बसपा का गठबन्धन विधानसभा 2022 तक रह गया तो बीजेपी के लिए दिक्कत होगी और गठबन्धन नहीं किया तो सबको मालूम है कि बसपा 403 विधानसभा सीट में से केवल 1 सीट जीत सकी।


2024 लोकसभा में जहाँ एक तरफ इंडिया और एक तरफ एनडीए गठबंधन है , वहीँ बसपा अकेले लड़ने की बात लगातार करती रही है , इसके पीछे की क्या वह है इसका अंदाजा तो हम आकाश आनंद की बात से आगे लगाएंगे लेकिन राजनीति में कहा गया कि बीजेपी के इशारे पर बहन जी ने इंडिया गठबंधन में शामिल होने की शर्त नहीं मंजूर किया और अकेले लड़ रही हैं , इससे बसपा की कोई सोशल इंजीनियरिंग दिखाई नहीं दे रही है , यह सन्देश है कि भाजपा का ही इशारा है . आगे आकाश आनंद ने कहा कि बसपा का लक्ष्य सत्ता पाना है और वे इसके लिए किसी से समझौता कर सकते हैं चुनाव बाद देखा जायेगा।


अभी लोकसभा का चुनाव चल रहा है ऐसे समय में आकाश आनंद का ऐसा बयान बसपा को कहाँ लाकर खड़ा करता है ? क्या आकाश आनंद दलित मुस्लिम गठजोड़ बना पाएंगे ? या फिर कौन सी रणनीति के तहत लोकसभा का चुनाव अकेले लड़ी है बसपा ?
एक रानीतिक विश्लेषक के रूप में बात करे तो लगता है की बसपा ऐसे प्रत्याशी देना चाहती है इससे बीजेपी ज्यादा से ज्यादा चुनाव हारे और अगले विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के बसपा से गठबंधन करे , अब बीजेपी कमजोर होगी तो वह नए पार्टनर की तलाश करेगी जिसमें बसपा ज्यादा ताकतवर पार्टनर बन सकती है। और बसपा के लोकसभा प्रत्याशी ऐसे हैं भी जो बीजेपी प्रत्याशी को नुक्सान पंहुचा रहे हैं। लेकिन अगर यह रणनीति है बसपा की तो यह तो और भी खतरनाक है। सपा मजबूत हो जाएगी और आकाश आनंद के बयान के बाद दलित मुस्लिम गठजोड़ भी खटाई में पड़ जायेगा।
और अगर अपने मतदाताओं का भरोसा जीतना था तो इंडिया गठबंधन में चुनाव लड़ जाते , इससे विधानसभा 2027 में भी आसानी होती , सपा से न बात बनती तब बीजेपी से बात करते। लेकिन लोकसभा चुनाव चल रहे हैं और इस दौरान आकाश आनंद का बीजेपी के पक्ष में कोई भी बयान बसपा की राजनीती को चौपट कर रहा है। बसपा के मिशन के तहत सामंतवाद से लड़ना था और बसपा के कैडर के लोग कितना बर्दास्त करेंगे कि उन्ही सामंती ताकतों से बसपा का गठबंधन हो।


आकाश कि जिम्मेदारी है बसपा को सत्ता में लाने का , लेकिन इस तरह के बयानों से बसपा को सत्ता से दूर करते चले जा रहे हैं।

AT Samachar
Author: AT Samachar

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