किसानों आदिवासियों के हक और न्याय की लड़ाई कांग्रेस के साथ! धत तेरे की!

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सीधी, एमपी। आजादी के बाद देश में विभिन्न प्रकार के किसान आंदोलन और आदिवासी आंदोलन हुए हैं, जिनके दमन में तब की सरकारों ने कोई कोताही नहीं बरती है। किसानों आदिवासियों के हक और न्याय की लड़ाई लड़ते हुए जन संगठनों के साथी तमाम बाधाओ को चुनौती देते हुए जीवन लगा रहे हैं।

देश भर में चल रहे किसान आदिवासी आंदोलन में अपने  को शामिल करते हुए कांग्रेस भी हाथ सेंकने का ढोंग कर रही है। कांग्रेस जब-जब सत्तानसी हुई है किसानों आदिवासियों के साथ छल किया है। किसानों की भूमियां और आदिवासियों के जल जंगल जमीन को उद्योगपतियों को लुटाया है। देश में चल रहे किसानों और आदिवासियों के जिंदगी और वजूद बचाने के संघर्ष में कांग्रेस के शामिल होने के दिखावा से सचेत होना होगा जन आंदोलन के साथियों को! सत्ता पाने की छटपटाहट सत्ता न मिलने की अकुलाहट में हाथ पांव मार रही है कांग्रेस, सत्तासीन होने पर किसानों और आदिवासियों के प्रति वही पुरानी शाज और आवाज कांग्रेस की रहेगी।1950 से 1990 के बीच देश में 87 लाख  आदिवासी विस्थापित किए गए है।

 इतिहास दर्पण भी है दर्शन भी है

कांग्रेस और भाजपा सरकारों में किसान और आदिवासी आंदोलन के दमन का सिलसिला रहा है। हक और न्याय के लिए किए गए आंदोलन के दमन की झलक-

तेलंगाना आंदोलन (1948-51) से लेकर 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान कांग्रेस और भाजपा सरकार में पुलिस द्वारा किसानों पर हमला हिंसक दमन और गिरफ्तार किया गया गया है।

• तेलंगाना आंदोलन में किसान विद्रोहियों पर सैन्य कार्यवाही की गई इस दौरान 2000 से अधिक गाँवों में 300,000 लोगों को यातनाएँ दी गईं, लगभग 50,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया और कुछ दिनों से लेकर कुछ महीनों तक (नजरबंदी) शिविरों में रखा गया। 5,000 से अधिक लोगों को वर्षों तक कैद में रखा गया।

•  2020-21 में जब किसान मोदी से वादा पूरा करने की बात कहने दिल्ली आना चाहते हैं तो उन्हें दिल्ली प्रवेश पर प्रतिबंधित किया गया, किसान दिल्ली की सीमाओं पर कड़कडाती ठण्ड, भीषण लू और गर्मी तथा भरी वर्षात में साल भर से ज्यादा समय तक सड़क पर रहते है। इस दरमियान सरकार के नुमाइंदों द्वारा किसानों को आतंकवादी, खालिस्तानी, देशद्रोही, आंदोलनजीवी जैसी गालियां दी गई। किसन की राह में किलें, कटीले तार, कंटेनर और बड़ी दीवाल के बैरिकेड लगाए गए। इस आंदोलन में लगभग 750 किसान शहीद हुए।लोकसभा में मोदी सरकार से पूछा गया था कि क्या  सरकार मारे गए किसानों को कोई मुआवजा देगी? इस सवाल के लिखित जवाब में कृषि मंत्री नें कहा कि कृषि मंत्रालय के पास किसान आंदोलन की वजह से किसी किसान की मौत का कोई रिकॉर्ड नहीं है। ऐसे में मृतक किसानों को वित्तीय सहायता देने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

• कांग्रेस सरकार में बैतूल जिले की मुलताई में 12 जनवरी, 1998 को किसानों के शांतिपूर्ण आंदोलन पर पुलिस की अंधाधुंध फायरिंग में 24 मौतें हुई थीं। फसल के मुआवजे के लिए आंदोलन कर रहे किसानों पर पुलिस की यह बर्बरता एमपी के इतिहास के काले अध्यायों में शामिल है।

• भाजपा सरकार में 6 जून 2017 को मंदसौर में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस द्वारा गोली चलाई गईं थी जिसमें 5 किसानों की जान चली गई थी। मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार की यह बर्बरता सत्ता के चरित्र को दर्शाती है।

• देश के जिन 565 जागीरदारों ने अपनी रियासतें भारत वर्ष में संविलिनीकरण किया उनमें से 258 रियासतें गोंडवाना अंचल के गोंडी राजा महाराजाओं की थी! उसी में से एक महाराजा प्रविर चंद्र भंजदेव  का भी राज्य था ! राजा प्रविर चंद्रजी अपने राज्य में आदिवासी व गोंड समाज में सबके पसंदीदा राज्यकर्ता थे ! आजादी के बाद मध्य प्रदेश के क्रांग्रेस सरकार की ओर से बस्तर और आसपास के इलाके से नैसर्गिक खनिज संपत्ती लूटने के जोरदार प्रयास किये गये ! वहा के आदिवासीयों को उसका सही मुआवजा नही मिल रहा था ! इस बात का महाराजा प्रविर चंद्रजी ने विरोध किया और साथ साथ सरकार से एक अलग राज्य की मांग की ! जिसके चलते 25 मार्च 1966 को क्रांग्रेस सरकार के निर्देश पर पुलिस ने उनके जगदलपुर स्थित महल में उनकी हत्या कर दी ! उनके बचाव के लिये आये 150 से अधिक आदिवासीयों का नरसंहार कर दिया !

• जुझारू मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी ने जब मजदूरों के हक की लड़ाई की शुरुआत की थी तब दल्ली और राजहरा स्थित लौह अयस्क खदानों में ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की बहुत बुरी दशा थी 14-16 घंटे काम करने के बदले उन्हें महज दो रुपए मजदूरी मिलती थी। शंकर गुहा ने इन मजदूरों को साथ लेकर छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ का गठन किया। इसके बैनर तले मजदूरों के कल्याण के लिए कई गतिविधियां की। सफलताओं ने एक ओर मज़दूर वर्ग और कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया, वहीं दूसरी ओर इसने राज्य सरकार और पूँजीपतियों के गुस्से को भड़काया, जिसके परिणामस्वरूप 28 सितंबर 1991 को भाड़े के हत्यारों द्वारा कॉमरेड गुहा नियोगी की हत्या कर दी गई थी।

तमिलनाडु (कुंदुकुलम) में न्यूक्लियर पावर प्लांट के विरोध का किसान आंदोलन, कर्नाटक में राज रैयत  किसान आंदोलन, उड़ीसा (नियमगिरी) में स्टील प्लांट के खिलाफ किसानों का आंदोलन, राजस्थान में मेदांता द्वारा एल्युमिनियम, गोल्ड, आयरन खनन विरोधी किसान आंदोलन, छत्तीसगढ़ में हसदेव जंगल को बचाने का आदिवासियों का आंदोलन, हरदा बैतूल जिले में गंजाल मोरंड बांध और अभ्यारण बनाने के खिलाफ आदिवासियों का आंदोलन, नर्मदा सागर बांध से विस्थापित किसानों का आंदोलन, बरगी बांध से विस्थापित किसानों का आंदोलन, चुटका परमाणु संयंत्र स्थापना विरोधी किसान आंदोलन, अनूपपुर में मोजर बेयर पावर प्लांट से विस्थापित किसानों का आंदोलन, सतना, मैहर, नौबस्ता, बघवार (सीधी) में सीमेंट प्लांट से प्रभावित किसानों का आंदोलन, सतना मैहर में टावर लाइन से प्रभावित किसानों का आंदोलन, सिंगरौली जिले में अधिग्रहण और विस्थापन के विरोध में किसानों एवं आदिवासियों का आंदोलन, सीधी जिले (मूसामुड़ी भुमका) में पावर प्लांट के लिए किए भू अधिग्रहण विरोधी आंदोलन, संजय टाइगर रिजर्व सीधी के 54 ग्रामों के किसानों और आदिवासियों का विस्थापन विरोधी आंदोलन।

जो भी सरकार रही हो इन विरोधी आंदोलनों के दमन में पुलिस कार्रवाई, कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, नजरबंदी, यातना, हत्या, और ऐसे आंदोलनों के लिए समर्थन करने वाले व्यक्तियों पर अदालती कार्रवाई की गई हैं। दमन के अन्य रूपों में दुष्प्रचार, सूचना नियंत्रण, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रतिबंधित की गईं, लोगों को विरोध करने से हतोत्साहित करने के लिए।

AT Samachar
Author: AT Samachar

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