मंडल प्रभारी अवनीत कुमार शर्मा की रिपोर्ट
रामपुर। “मनुष्यता के पथ-प्रदर्शक श्री राम” विषय पर आधारित कला प्रदर्शनी एवं व्याख्यान का हुआ आयोजन। रामपुर रज़ा पुस्तकालय एवं संग्रहालय, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार तथा मेघवर्ण आर्ट गैलरी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “मनुष्यता के पथ-प्रदर्शक श्री राम” विषय पर आधारित कला प्रदर्शनी एवं व्याख्यान कार्यक्रम आज अत्यंत गरिमामय वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं भगवान श्रीराम को पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इसके उपरांत विशिष्ट अथिति श्री राधे श्याम वसन्तेय जी द्वारा कला प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के उपरांत सभी के द्वारा अवलोकन किया गया। कार्यक्रम में देश-विदेश से आए ख्यातिलब्ध विद्वानों, कलाकारों, साहित्यकारों एवं कला-प्रेमियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि एवं सम्मानित अतिथियों की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और अधिक बढ़ाया। सांस्कृतिक सत्र के अंतर्गत पं. रवि कथा जी द्वारा शास्त्रीय प्रस्तुति तथा गुरुकुल कथक केंद्र द्वारा प्रस्तुत कथक नृत्य “रघुनाथ गाथा” ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रामपुर रज़ा पुस्तकालय के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्श आज के समाज के लिए नैतिकता, मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना के प्रेरक स्तंभ हैं। उन्होंने कहा कि राम केवल किसी आस्था के आदर्श नहीं हैं, न ही किसी मज़हब, संप्रदाय या पंथ के। राम किसी एक भाषा, भूभाग, नस्ल या जाति के भी आदर्श नहीं हैं; राम संपूर्ण मानवजाति के आदर्श हैं। पृथ्वी पर जन्मा कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है, जिसके पुरखे राम न हों। संपूर्ण मानवजाति के पुरखे राम हैं, जिन्होंने अपनी मर्यादा और अपने आचरण से ऐसा चरित्र प्रस्तुत किया कि संपूर्ण धरा पर उसका गुणगान करते हुए कोई थकता नहीं है। उन्होंने कहा हिय की प्यास बुझे न बुझाई, बार-बार रामकथा कही जाती है।
कहा कि रामकथा पृथ्वी के अनेक भागों में कही जाती है, किंतु हिय अर्थात् हृदय की प्यास उसे सुनने से और बढ़ती जाती है, बुझती नहीं है। पुनः-पुनः सुनने का मन करता है—ऐसी अद्भुत है रामकथा। कहा कि राम को धर्म-विग्रह भी कहा गया है। महर्षि वाल्मीकि कहते हैं कि राम धर्म के साक्षात् विग्रह हैं। राम को जानना है तो धर्म को जाने बिना राम को नहीं जाना जा सकता, क्योंकि वे धर्म के मूर्त रूप हैं। यह भी कहा गया है।
“जानत-जानत तुम्हीं होई जाई”
अर्थात् जो राम को जान लेता है, वह स्वयं राम हो जाता है; और जो धर्म को जान लेता है, वह स्वयं धर्म हो जाता है।
धर्म की सबसे सुंदर परिभाषा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की आदिपंक्ति में दी है—
“परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।”
अर्थात् दूसरे का हित करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है और दूसरे को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है।
इसी भाव को महर्षि व्यास ने कहा है कि समस्त पुराणों की रचना के उपरांत वे दोनों हाथ उठाकर यह उद्घोष करते हैं कि परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नहीं है और दूसरे को कष्ट पहुँचाने से बड़ा कोई पाप नहीं है। यही धर्म है। यह धर्म कोई पंथ या संप्रदाय नहीं है, बल्कि “आचारः परमो धर्मः” के अधिष्ठान पर खड़ी वह जीवन-पद्धति है, जो आचरण से प्राप्त होती है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति धर्म का परायण करता है, वही स्वयं धर्म हो जाता है।
उन्होंने कहा कि धर्म-विग्रह राम को कोई बाँध नहीं सकता—न शब्दों में, न किसी अभिव्यक्ति में। स्वयं राम मर्यादा हैं—मर्यादा पुरुषोत्तम राम। समस्त शक्तियों और बलों के होते हुए भी मर्यादा में रहकर कैसे आचरण किया जाए, यह सीखना हो तो राम से सीखा जा सकता है। इसी कारण राम संपूर्ण मानवजाति के पुरखे और आदर्श बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि विश्व में रामकथा के अतिरिक्त किसी अन्य कथा का प्रभाव और उसकी पुनरावृत्त अभिव्यक्ति इतनी व्यापक और सतत रही हो।
निदेशक महोदय जी ने इस सफल आयोजन हेतु सभी सहयोगी संस्थाओं, कलाकारों, विद्वानों एवं सहभागियों का आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में यूएसए से डॉ. जॉर्ज जैकब विश्वविख्यात संग्रहालय विशेषज्ञ, लेखक एवं ICOM USA के बोर्ड सदस्य ने कहा कि राम के देखने का दृष्टिकोण व्यापक पैमाने पर है; यह किसी एक क्षेत्र, देश या आस्था से सीधे जुड़ा नहीं है। उनका जीवन-पथ और उनके आदर्श पवित्र हैं, और उन्हें सार्वभौमिक रूप में उत्सव की तरह मनाया जाना चाहिए। प्रदर्शनी में “अपने-अपने राम नामक एक रचना थी। मैं यहाँ कुछ ऐसे दृष्टिकोण प्रस्तुत करूँगा जो मेरे निजी अनुभवों से जुड़े हैं।
हमेशा यह ध्यान रहता है कि हम बहुत कम जानते हैं और अनेक विषयों पर हमारी जानकारी सीमित है। इसी चेतना के साथ जब हम किसी विषय को अपनाते हैं, तो वह हमारे लिए विस्मय और आश्चर्य का विषय बन जाता है—क्योंकि प्रश्न यह होता है कि ज्ञान को संग्रहालय के अनुभव में कैसे रूपांतरित किया जाए।
आज सुबह आचार्य जी ने कहा कि नदी का दृश्य देखना एक बात है, लेकिन नदी में उतरना एक अनुभव है। उन्होंने आपके कार्यालय में विश्व-अणु की बात भी कही थी। आज जो भी विचार सामने आए, वे कहीं न कहीं मेरे संग्रहालय अनुभवों से जुड़े हुए हैं।
इस अवसर सूर्यप्रकाश पाल , दर्जा राज्य मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा कि राम दो अक्षरों से मिल करके बनता राम। हम एक बार बोलते हैं तो यह सम्बोधन है। अगर हम इसको दो बार बोल देते हैं राम राम तो ये अभिवादन हो जाता है। हम इसी राम को जब हम तीन बार बोल देते हैं राम राम राम। तो ये संवेदना हो जाता है और इसी राम को जब हम अनेक बार बोलते हैं तो यह संकर्तिन हो जाता है और यह राम को जब हम लगातार बोलते हैं तो इससे हमें सिद्धि प्राप्त हो जाती है। ऐसे भगवान राम जो घट घट वासी है, जो हमारे रोम रोम में रमे हैं, बसे हैं ऐसे भगवान राम की व्याख्या वास्तव में सूरज को दीपक जलाने जैसी है।
इस अवसर पर वरिष्ठ कलाकार एवं कला समीक्षक श्री अरविंद ओझा जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कला की जितनी भी अभिव्यक्तियाँ हैं, वे ज्ञान और प्रेम के रूप में प्रकट होकर समस्त जगत में विस्तारित होती रहती हैं। दृष्टि अत्यंत महत्वपूर्ण है, और हम सभी कलाकारों को इसके प्रति सजग एवं सचेत रहना चाहिए, क्योंकि भगवान राम स्वयं एक जाग्रत और सचेतन दृष्टि हैं। वे वही दृष्टि हैं, जहाँ भी हम उनका संधान करते हैं। जब हम उन्हें अपने हृदय में स्मरण करते हैं या वहाँ स्थान देते हैं, तो हमारे अंतःकरण का रूपांतरण स्वतः आरंभ हो जाता है। उन्होंने आगे कहा कि इस जीवन में केवल क्रिया महत्वपूर्ण नहीं है; क्रिया के साथ ज्ञान-तत्त्व का होना आवश्यक है। क्रिया से बड़ा कर्म है, कर्म से बड़ा कर्ता है, कर्ता से बड़ा विचार है, विचार से बड़ी इच्छा है, इच्छा से बड़ा सौंदर्य है, सौंदर्य से बड़ा संकल्प है, संकल्प से बड़ी नैतिकता है, नैतिकता से बड़ा धर्म है, और धर्म से बड़ा सत्य है। यह वही सत्य है, जिसे हमारी सनातन परंपरा ने ऋति कहा है। यही वह सत्य है, जिसे मीमांसा दर्शन ने इस प्रकृति का महान नियम माना है। यही वही सत्य है, जिसे कृषि परंपरा और लोकचेतना ने ऋतु कहा है। और यही वही सत्य है, जिसे अब तक की मानव जाति की सर्वोच्च चेतना ने भगवान राम के रूप में स्वीकार किया है।
इस अवसर पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. अरुण प्रकाश जी ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि जब कुम्हार चाक पर मिट्टी रखता है, तो चाक के घूमने के साथ-साथ वह स्वयं भी रीतता और बीतता है; किंतु जैसे-जैसे स्वरूप उभरता है, वैसे-वैसे वह उसमें अपना ही स्वरूप देखने लगता है। कला भी इसी प्रकार अपने आत्मवैभव, अपने चिंतन और अपने भीतर चल रहे भावों को—जो अन्य माध्यमों से अभिव्यक्त नहीं हो पाते—कागज़ या कपड़े पर उतार देने की प्रक्रिया है। उन्होंने आगे कहा कि इस संदर्भ में गुरु नानक देव जी की एक अत्यंत सुंदर पंक्ति स्मरणीय है—“आत्म में राम, राम में ही आत्म।” किन्तु यह कोई किताबी बूझ मात्र नहीं है। इसके आगे गुरु नानक जी कहते हैं—“चीनीस गुर विचारा।” यहाँ चीनीस का अर्थ है पहचानना। अर्थात् यह अनुभूति उन्होंने गहन अभ्यास और विचार के माध्यम से प्राप्त की। यह अभ्यास और विचार सबके लिए सहज रूप से सुलभ नहीं है, किंतु कलाकार के लिए यह स्वाभाविक और सहज होता है। उन्होंने कहा कि यहाँ चित्रकला के माध्यम से राम के विविध रूपों की जो अत्यंत सुंदर अभिव्यक्तियाँ प्रस्तुत की गई हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं। जिन सभी कलाकारों ने अपनी पेंटिंग्स प्रदर्शित की हैं, वे निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं।
आज आयोजित इस कार्यक्रम के अवसर पर देश-विदेश के प्रतिष्ठित कलाकारों द्वारा निर्मित चित्रकृतियों की एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी में रामपुर के श्री नवल किशोर एवं श्रीमती रचना राणा, अमेरिका से डॉ. जॉर्ज जैकब, दिल्ली से श्रीमती सुमित्रा अहलावत, श्री विनोद कुमार कंवर, सुश्री कविता राजपूत एवं श्री राम ओंकार, तमिलनाडु से श्री के. विश्वनाथन, जयपुर (राजस्थान) से श्री अजय मिश्रा, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) से श्रीमती प्रतिभा पांडेय, मेरठ से डॉ. प्रिंस राज तथा गाजियाबाद से श्री कमल किशोर की कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गईं। इन सभी कलाकारों की रचनाओं ने दर्शकों को भारतीय कला-परंपरा, भावबोध और सौंदर्यबोध के विविध आयामों से परिचित कराया तथा प्रदर्शनी को विशेष रूप से समृद्ध बनाया।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर कलाकारों को प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए गए तथा मेघवर्णा आर्ट गैलरी की संस्थापक रचना राणा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया।
यह आयोजन रामपुर रज़ा पुस्तकालय की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक गतिविधियों में एक महत्वपूर्ण और स्मरणीय उपलब्धि सिद्ध हुआ।










