कालिंदीपुरम में भागवत कथा का दूसरा दिन
त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट
प्रयागराज। जीवन में एक बार भागवत कथा अवश्य सुननी चाहिए -जन्मेजय। मानव तन पाकर भागवत कथा अवश्य सुननी चाहिए, यदि जिंदगी में नहीं सुनते वे पशु के समान है। साथ ही चांडाल और गधे के समान माना गया है। यह बात शुक्रवार को कालिंदीपुरम के नंद गांव में नंदेश्वर महादेव मंदिर परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन आचार्य जन्मेजय कृष्ण ने कही।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता में कभी खो नहीं जाना चाहिए सनातन धर्म जीवन जीने की कला सिखाता है। भागवत कथा सुनने से बड़े बड़े पापी भी तर जाते हैं , नारद जी कहते है कि यदि प्रेत योनि में जन्म लेने वाले का भी उद्धार हो जाता है यदि वह श्रीभागवत कथा सुन लेता है। किसी प्रेत का उद्धार हुआ तो उसका नाम है गोकर्ण है, उसने भागवत कथा सुनी । जीवन में सुख और दुख मानव के कर्म से आते हैं।कर्म का भोग हर प्राणी को भोगना पड़ता है। तुंगभद्रा नदी के किनारे आत्मा देव शर्मा रहते थे वे प्रकांड विद्वान थे और उनकी पत्नी का नाम धुंधली थी वह मंद बुद्धि की और झगड़ालू थी, उनके कोई संतान नहीं थी, वे आत्म ग्लानि में घर छोड़कर कर जंगल चले गए और रो रहे थे। वहां से गुजर रहे संन्यासी ने उनसे रोने का कारण पूछा, उन्होंने बताया कि संतान न होने से घर में अच्छा नहीं लग रहा है संन्यासी ने बताया कि आप की ललाट में लिखा है कि सात जन्म में भी संतान नहीं होगी। तब आत्मदेव ने पत्थर पर ललाट पटकर जान देने की कोशिश की , तब संत ने एक फल दिया और कहा कि पत्नी को खिला दोगे तो पुत्र ज़रूर होगा, वे फल लेकर पत्नी को दिया, उसकी पत्नी ने संशय में फल नहीं खाया। दूसरे दिन उसकी बड़ी बहन महाधुंधली आयी और उसको बताया कि इस के खाने से कोई संतान नहीं होती अतः गाय को खिला दिया, महाधुंधली ने अपना पुत्र अपनी छोटी बहन को दे दिया, तो उस बालक का धुंधकारी पड़ा, जो गाय से पैदा हुआ उसका नाम गोकर्ण हुआ वह महान विद्वान हुआ। जब कि धुंधकारी महादुष्ट निकला।
कथा के समापन के समय हरियाणा से आए संत आत्माराम, बार काउंसिल ऑफ उ प्र के पूर्व अध्यक्ष आई चतुर्वेदी, आचार्य राजेश त्रिपाठी को सम्मानित किया गया। कथा में सेवानिवृत्त कैप्टन एस एन तिवारी, रवि वर्मा, संजय सिंह, योगेश त्रिपाठी, टिंकू, सरोज तिवारी, सत्येन्द्र यादव, योगेश कुमार मिश्र, प्रभा आर उपाध्याय, मीनाक्षी जायसवाल सहित सैकड़ों महिलाएं, पुरुष उपस्थित रहे।










