जोगी बने पति, प्रतीक्षा बनी नियति मंच पर जीवंत हुई सावित्री की पीड़ा।

जोगी बने पति, प्रतीक्षा बनी नियति मंच पर जीवंत हुई सावित्री की पीड़ा।

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बीआरएम के समापन पर स्त्री विमर्श की मार्मिक प्रस्तुति ने दर्शकों को झकझोरा

त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट 

प्रयागराज। जोगी बने पति, प्रतीक्षा बनी नियति मंच पर जीवंत हुई सावित्री की पीड़ा। हिंदी रंगमंच में आजकल बहुत कम ऐसे नाटक देखने को मिलते हैं जिनकी प्रस्तुति हर पैमाने पर पूरी तरह खरी उतरती हो और जिनमें कथ्य, संवाद, अभिनय और निर्देशन का सधा हुआ कसाव दिखाई दे। किसी नाटक की सफलता केवल निर्देशक पर निर्भर नहीं करती, बल्कि कलाकारों के सशक्त अभिनय और सटीक संवादों की भी उसमें अहम भूमिका होती है।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भारत रंग महोत्सव के समापन अवसर पर रविवार को विजय पंडित द्वारा लिखित नाटक “जोगिया राग” का मंचन देवेन्द्र राज अंकुर के निर्देशन में केंद्र प्रेक्षागृह में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि महापौर उमेश चन्द्र गणेश चन्द्र केसरवानी एवं केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।

विजय पंडित का यह नाटक एक ग्रामीण स्त्री के जीवन में गृहस्थ कामना की पुकार की कथा है। सावित्री नामक एक स्त्री अपने वैवाहिक जीवन को जीना चाहती है, लेकिन उसका ब्राह्मण पति बालमुकुंद तिवारी “जोगी” बनकर घर छोड़ देता है। सावित्री पंद्रह वर्षों तक उसके लौटने की प्रतीक्षा करती है और अधूरा जीवन जीती रहती है। इस दौरान समाज और बिरादरी उस पर विधवा जीवन स्वीकार करने का दबाव डालते हैं, किंतु वह अपने पति के जीवित होने के विश्वास को नहीं छोड़ती।

जोगी बने पति, प्रतीक्षा बनी नियति मंच पर जीवंत हुई सावित्री की पीड़ा।

पंद्रह वर्षों बाद जब उसे पता चलता है कि पड़ोसी गांव में जोगियों का एक दल आया है, तो वह आशा लेकर वहां पहुंचती है। पंचायत की मध्यस्थता में उसकी मुलाकात जोगियों से होती है और वह एक जोगी को अपना पति समझकर उससे गृहस्थ जीवन में लौटने का प्रश्न करती है। वह व्यक्ति सावित्री की भावनाओं को स्वीकार कर उसके साथ वैवाहिक जीवन अपनाने को तैयार हो जाता है। इस सुखांत प्रसंग के माध्यम से नाटक स्त्री जीवन के अनेक द्वंद्व, विडम्बनाएं और सामंती मूल्यों के भीतर छिपी उसकी मार्मिक पीड़ा को उजागर करता है।

एनएसडी के पूर्व निदेशक देवेन्द्र राज अंकुर के संवेदनशील निर्देशन में प्रस्तुत यह नाटक लंबे समय तक दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर छाया रहने वाला सिद्ध हुआ। सशक्त कथ्य, कसावदार प्रस्तुति और प्रभावी अभिनय ने यह सिद्ध किया कि जब नाटक का विषय मजबूत हो और कलाकार उसे पूरी ईमानदारी से मंच पर उतारें, तो वह दर्शकों के मन पर अमिट छाप छोड़ा। दर्शकों के तालियां इस बात का गवाह बनी।

नाटक में निधि मिश्रा एवं मुक्तिदास ने अपने उत्कृष्ट अभिनय से दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इस अवसर पर नाट्य निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर, कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय, उपनिदेशक (कार्यक्रम) डॉ. मुकेश उपाध्याय तथा वरिष्ठ रंगकर्मी अमिताभ श्रीवास्तव, मनोज कुमार, एस. मलतियार व विजय पंडित केंद्र निदेशक द्वारा स्मृति-चिन्ह एवं अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की प्रथम कड़ी में “बड़े भाई साहब” नाटक पर शैलेन्द्र मधुर एवं दिलीप तिवारी ने वार्ता प्रस्तुत की।

AT Samachar
Author: AT Samachar

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