स्त्री के आधे-अधूरेपन की त्रासदी को दिखा गया नाटक हयवदन।

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त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट

प्रयागराज। स्त्री के आधे-अधूरेपन की त्रासदी को दिखा गया नाटक हयवदन। मंच पर जैसे ही कथा आरंभ होती है, एक अनोखी दुनिया दर्शकों के  सामने खुलती है जहाँ मनुष्य अपने ही अस्तित्व से जूझ रहा है, जहाँ प्रेम केवल भाव नहीं, बल्कि एक गहरा द्वंद्व बन जाता है गिरीश कर्नाड का प्रसिद्ध नाटक ‘हयवदन’ इसी सवाल को बहुत सरल लेकिन असरदार तरीके से दर्शको के सामने रखता है। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय नाट्य समारोह के दूसरे दिन शनिवार को गिरीश कर्नाड द्वारा लिखित नाटक हयवदन का मंचन केन्द्र प्रेक्षागृह में किया गया। नाटक का निर्देशन किया था नाट्य निर्देशक महेन्द्र सिंह ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि आर.पी. शुक्ला, उपाध्यक्ष, सेवा भारती, प्रयागराज, उपनिदेशक कार्यक्रम डॉ. मुकेश उपाध्याय तथा कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय ने दीप जलाकर किया।

द्वंद्वपूर्ण आधुनिक कहानी पर आधारित नाटक में देवदत्त, पद्मिनी और कपिल के त्रिकोणीय प्रेम को दिखाया। मुखौटे, गुड्डे गुडिय़ों और गीत संगीत से नाटक ने अपनी छाप छोड़ी। दो-दो पुरुषों के होते हुए भी अतृप्त एवं अधूरी और सुहागिन होकर भी अभागिन रह जाने वाली पद्मिनी इस नाट्य कथा में केंद्र बिंदू रही। जिससे विलक्षण प्रसंग, रोचक चरित्र, जटिल संबंध, रोमांचक नाट्य मोड़ों के साथ नाटक की कहानी आगे बढ़ी। कपिल देवदत्त का विवाह प्रस्ताव पद्मिनी के घर लेकर जाता है। जहां पद्मिनी को देख कपिल उस पर आसक्त हो जाता है। किंतु देवदत्त के साथ अपनी मित्रता की मर्यादा उसे रोक देती है। वह उन दोनों का विवाह करवा देता है। किंतु पद्मिनी सुडौल शरीर वाले कपिल की ओर आसक्ति रखने लगती है। जिससे देवदत्त परेशान हो जाता है। एक दिन काली मंदिर में जाकर देवदत्त अपनी गर्दन काट लेता है। जब कपिल उसे ढूंढते हुए वहां पहुंचता है तो मित्र वियोग में वह भी स्वयं की गर्दन काट लेता है।

दोनों के बदले सिर धड़-पर इच्छाएं नहीं पूरी : बाद में पद्मिनी आती है और दोनों के सिर कटे देख मां काली का आह्वान करती है। मां काली प्रकट होती है और दोनों के शीश जोड़ने को कहती है। पद्मिनी कपिल के शरीर पर आसक्त देवदत्त का सिर कपिल के शरीर पर और कपिल का सिर देवदत्त के शरीर पर जोड़ देती है। पद्मिनी को सुंदर चेहरा और सुडौल शरीर दोनों एक ही व्यक्ति में मिल जाते हैं। धीरे धीरे कहानी आगे बढ़ती है तो देवदत्त ब्राह्मण होने के कारण पूजा पाठ में ही लगा रहता है, जिससे उसका शरीर धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है। उधर कपिल मेहनत करके देवदत्त के शरीर को भी सुडौल बना लेता है। इस प्रकार पद्मिनी की एक ही पुरुष में सुंदरता और सुडौल तन पाने की चाह समाप्त हो जाती है।मुख्य कथा के साथ-साथ ही एक उप-कथा घोड़े के सिर वाले आदमी (हयवदन) की भी साथ चलती है, जिसमें हास्य का भी पुट है।

जहाँ ‘आधे-अधूरे’ नाटक सामाजिक यथार्थ के ताने-बाने से लिखा गया है, वही ‘हयवदन’ लोक (फोक), मिथक और तंत्र-मंत्र से सामग्री उठाता है। सूत्रधार, मुखौटे, गुड्डे-गुड़ियों और गीत-संगीत का इस्तेमाल कथानक को कुशलता से आगे बढ़ाता है और दर्शकों को पूरे नाटक के दौरान बांध कर रखता है। नाटक का संगीत, नाट्य तकनीक कलाकारों के अभिनय में निखार लाने में सहायक थी। कार्यक्रम का संचालन आकांक्षा पाल ने किया।

AT Samachar
Author: AT Samachar

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