एआई मानवीय संवेदनाओं का विकल्प नहीं- प्रो. अजय जेटली।

एआई मानवीय संवेदनाओं का विकल्प नहीं- प्रो. अजय जेटली।

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त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट

प्रयागराज। एआई मानवीय संवेदनाओं का विकल्प नहीं- प्रो. अजय जेटली। “कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि मानव के आंतरिक विकास और संवेदनशीलता की आधारशिला है। आधुनिक डिजिटल युग में तकनीकी हस्तक्षेप, विशेषकर एआई के बढ़ते प्रभाव के बावजूद, मानवीय सृजनशीलता और ‘ह्यूमन टच’ का कोई विकल्प नहीं हो सकता।” उक्त बातें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दृश्य कला विभाग के विभागाध्यक्ष एवं प्रो. अजय जेटली ने उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा शनिवार को बहुउद्देशीय हाल में आयोजित विमर्श कार्यक्रम में दूसरी श्रंखला में कही।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य वक्ता प्रो. अजय जेटली, कार्यक्रम प्रभारी कृष्ण मोहन द्विवेदी एवं गायक मनोज गुप्ता ने दीप प्रज्वलित कर किया। प्रो. अजय जेटली ने कहा कि मनुष्य और पशु के बीच का प्रमुख अंतर उसकी सृजनशीलता और बौद्धिक क्षमता है। आदिम काल में, जब भाषा और संगठित समाज का अभाव था, तब भी मनुष्य ने चित्रों के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कला केवल बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मा की सजगता है, जो मनुष्य को संस्कारित और संवेदनशील बनाती है।

कला केवल चित्रकला या मूर्तिकला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन जीने के तरीके में भी विद्यमान है। जहाँ व्यवस्था और अनुशासन है, वहीं कला है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक साधारण सब्जी विक्रेता द्वारा सब्जियों को व्यवस्थित ढंग से सजाना भी हमारे भीतर के सौंदर्य बोध को दर्शाता है। आधुनिक समय में डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि मोबाइल और सूचना क्रांति ने व्यक्ति को समाज और परिवार से दूर कर दिया है। आज लोग कला के साथ गहराई से जुड़ने के बजाय सतही रूप से उसे देखने लगे हैं, जिससे मौखिक परंपरा और लाइव कलाओं जैसे रंगमंच एवं शास्त्रीय संगीत के प्रति रुचि में कमी आई है।

एआई के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि “एआई कृत्रिम है, जबकि मनुष्य अकृत्रिम है। मशीन कभी भी मानवीय कल्पना और संवेदना का स्थान नहीं ले सकती।”
वर्तमान शिक्षा प्रणाली में प्रेरणादायक शिक्षण का अभाव होता जा रहा है और शिक्षक एवं छात्र दोनों कृत्रिम ज्ञान पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। इसके साथ ही आधुनिक वास्तुकला में सौंदर्य के स्थान पर उपयोगितावाद और बजट आधारित सोच का प्रभाव बढ़ा है, जिससे ऐतिहासिक भव्यता का अभाव दिखाई देता है।

कला और मनुष्य का संबंध अटूट है। तकनीकी संक्रमण के इस दौर में भी मानवीय संवेदनशीलता, अनुशासन और सृजनात्मकता ही समाज को संस्कारित बनाए रखेगी। इस अवसर पर केंद्र के समस्त अधिकारी, कर्मचारी एवं शहर के गणमान्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन मनोज कुमार ने किया।

AT Samachar
Author: AT Samachar

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