प्रयागराज में दीये बनाने में जुटे कारीगर। दिवाली पर मिट्टी के दीपक का होता है विशेष महत्व, बढ़ जाती है डिमांड
त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट
प्रयागराज। Dipaavalee से पहले घूमने लगा कुम्हारों की उम्मीदों का चाक, बच्चे, बूढ़े सभी दीये बनाने में बंटाते हैं हाथ। दिवाली के पहले कुम्हारों की उम्मीदों का चाक घूमने लगा है। मिट्टी के दीये सहित कई सामान बनाने में कारीगर जुट गये हैं। दिवाली के समय मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ जाती है। लोकल फॉर वोकल के तहत लोग बढ़-चढ़कर मिट्टी के दीए खरीद रहे हैं। जिससे मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा वापस लौट रही है। इसके साथ ही दिये बनाने वालों की आय में भी बढ़ोतरी हो रही है।
दिवाली Diwali पर मिट्टी के दीये का विशेष महत्व
दिवाली को लेकर आधुनिक लाइट और दीयों से बाजार भरा-पड़ा है। चमक-धमक के दौड़ में लोग इन इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं की और आकर्षित हो रहे हैं। Dipaavalee दिवाली में इलेक्ट्रॉन की लाइट और दीयों की खूब बिक्री होती है। लोगों ने मिट्टी के दीये जलाने धीरे-धीरे कम कर दिए हैं, लेकिन दिवाली पर मिट्टी के दीये का विशेष महत्व है। वहीं, लोकल फॉर वोकल अभियान को लेकर भी लोग मिट्टी के दीये खरीद रहे हैं।
मिट्टी के दीए बनाने में लागत अधिक
दिवाली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इस दीये को आज भी पारंपरिक तरीके से ही बनाया जाता है। जिससे इसकी लागत अधिक हो गई है। बाजार में आधुनिक और इलेक्ट्रॉनिक दीये के मुकाबले मिट्टी के दिये महंगे होते हैं। इसके बावजूद मिट्टी के दिये बनाने वाले कारीगरों को इसमें बचत कम होती है। लेकिन पूर्वजों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कुछ लोग मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हुए हैं। इसी तरह के रोजगार और कला को बचाए रखने के लिए प्रधानमंत्री मोदी लोकल पर वोकल पर जोर देते रहे हैं और इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है।

4 माह पहले से ही बनाने लगते हैं दीये
कारीगर दिवाली के 4 माह पहले से ही दीये बनाने शुरू कर देते हैं। करवा चौथ के समय से ही दीयों की मांग होने लगती है और देवउठनी तक मिट्टी के दीयों की मांग बनी रहती है।
परंपरा के अनुसार करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, अमावस्या और देवउठनी में मिट्टी के दीये जलाने का रिवाज है। कार्तिक माह में दीपदान का विशेष महत्व माना जाता है। जिससे इस दौरान मिट्टी के दीयों की काफी मांग होती है।
बच्चे, बूढ़े सभी दीये बनाने में बंटाते हैं हाथ
प्रयागराज शहर के कई इलाकों मोहल्लों में सैकड़ों लोग मिट्टी के दीये बनाने का काम करते हैं। यहां इनके पूर्वज भी दीये बनाते थे। प्राचीन समय से ही यहां के लोग मिट्टी के बर्तन, दीये और अन्य सामान बनाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इस काम में घर के बच्चे-बूढ़े सभी हाथ बंटाते हैं। कुछ कारीगर गणेश और दुर्गा की प्रतिमाएं भी बनाते हैं। ऑफ सीजन में मिट्टी के खिलौने भी बनाए जाते हैं। जिससे पूरे साल इन इलाकों में मिट्टी से सामान बनाने का काम चलता रहता है।
लोग नहीं ले पा रहे सरकारी योजना का लाभ
स्थानीय निवासी और कारीगरों ने बताया कि “यह व्यवसाय उनके परिवार का पारंपरिक धंधा है। यहां के हर परिवार के सदस्य चाहे वह पुरुष हो, महिला हो या बच्चा, मिट्टी के बर्तन बनाने में अपना योगदान देते हैं। मिट्टी के बर्तनों की लगातार बढ़ती मांग के कारण गांव के कुम्हारों को साल भर काम मिलता है। जिससे वे मुनाफा कमाते हैं। वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा भी रहे हैं, लेकिन सरकार से कोई मदद नहीं मिल रही है।”
5 हजार में आती है 1 ट्राली मिट्टी
दीया कारीगर भोला प्रजापति ने बताते हैं कि “आज आधुनिकता के दौर में मिट्टी का काम धीरे-धीरे फीका पड़ रहा है। हमें दीये बनाने के लिए देहात से मिट्टी लानी पड़ती है। एक ट्राली मिट्टी 5 हजार की आती है। दिये बनाने में लागत अधिक लगती है। जिससे ये दीये बाजार में भी महंगे होते हैं। जबकि इलेक्ट्रॉनिक दीये सस्ते में मिल जाते हैं और लोग चमक-धमक ज्यादा पसंद करते है। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक सामान ज्यादा बिकते हैं। फिर भी मिट्टी के दीये बनाने का कार्य पुश्तैनी है, जो लगातार चल रहा है।










