भरतपुर, राजस्थान। हमारी पुकार भी सुनलो सरकार। भरतपुर जिले में नेशनल हाईवे पर दिन-रात दौड़ते वाहनों के बीच अब सड़कों पर बैठे एवं चलते सांड औऱ गाय आम दृश्य बन गए हैं। कभी तेज़ रफ्तार में आती बस अचानक ब्रेक लगाती है, कभी बाइक सवार हड़बड़ाकर दिशा बदलता है। हर पल ऐसा लगता है मानो कोई अनहोनी बस एक कदम दूर खड़ी हो।
गौरतलब है कि बेज़ुबान जानवरों को शायद यह नहीं पता कि हाईवे क्या होता है, रफ्तार क्या होती है और टक्कर का मतलब क्या होता है। वह तो बस वहीं आकर बैठ जाते हैं जहाँ जगह और सुकून दिखाई देता है लेकिन उनकी यही मासूम मौजूदगी आम लोगों की ज़िंदगी के लिए खतरा बनती जा रही है। एक पल की चूक किसी परिवार को उजाड़ सकती है, किसी घर का चिराग बुझ सकता है और उसी हादसे में ये निरीह पशु भी अपनी जान गंवा सकते हैं। सबसे पीड़ादायक दृश्य तब सामने आता है जब मुख्यमंत्री जनसुनवाई केंद्र के बोर्ड के नीचे सांड और गाय बैठे दिखाई देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे ये बेज़ुबान भी अपनी खामोशी में सवाल पूछ रहे हों, क्या हमारी भी कभी सुनवाई होगी। क्या हमें भी सुरक्षित जगह मिलेगी। यह दृश्य प्रशासन और समाज, दोनों की संवेदनशीलता पर गहरा सवाल खड़ा करता है।
गौरतलब है कि सामाजिक गतिविधियों को बेहतर बनाने के लिए लगातार सक्रिय ऊषा सोलंकी, जो दरख़्त छाँव फाउंडेशन से जुड़ी हुई हैं, इस समस्या को केवल यातायात से जुड़ा मुद्दा नहीं मानतीं। सोलंकी के लिए यह इंसानियत का सवाल है, जहाँ एक ओर आम नागरिकों की जान खतरे में है, वहीं दूसरी ओर बेसहारा पशु उपेक्षा और अनदेखी का शिकार हैं। सोलंकी का कहना है कि यदि समय रहते ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाए गए, तो यह लापरवाही किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। उक्त समस्या किसी एक दिन में पैदा नहीं हुई और इसका समाधान भी एक दिन में नहीं होगा लेकिन इसकी शुरुआत ज़रूर होनी चाहिए। हाईवे और प्रमुख चौराहों से इन पशुओं को हटाकर उनके लिए सुरक्षित और सम्मानजनक स्थान उपलब्ध कराना सिर्फ़ प्रशासन की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक ज़िम्मेदारी है।










