कल्पवास जीवन को साधना में रूपांतरित करने की सात्विक परंपरा : डॉ. अलका प्रकाश।

कल्पवास जीवन को साधना में रूपांतरित करने की सात्विक परंपरा : डॉ. अलका प्रकाश।

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त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट 

प्रयागराज। कल्पवास जीवन को साधना में रूपांतरित करने की सात्विक परंपरा : डॉ. अलका प्रकाश। जब गंगा–यमुना के तट पर आस्था, साधना और संस्कृति का संगम सजीव होता है, तब शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते, वे जीवन-दर्शन बन जाते हैं। इसी भावभूमि पर उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘चलो मन गंगा–यमुना तीर’ कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित ‘शब्द-ब्रह्म’ संगोष्ठी में कल्पवास की सात्विक परंपरा और भारतीय जीवन दर्शन पर गहन विमर्श हुआ।

सांस्कृतिक केंद्र के बहुउद्देशीय हॉल में आयोजित संगोष्ठी के दूसरे दिन कार्यक्रम का शुभारंभ केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा एवं वक्ताओं ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस अवसर पर केंद्र निदेशक ने सभी वक्ताओं को अंगवस्त्र एवं पौधा भेंट कर सम्मानित किया।

“कल्पवास : सात्विक परंपरा एवं जीवन दर्शन” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. अलका प्रकाश ने कहा कि कल्पवास भारतीय अध्यात्म की वह सात्विक साधना है, जहाँ मनुष्य प्रकृति, संयम और आत्मचिंतन के माध्यम से अपने जीवन को शुद्ध करता है। यह परंपरा त्याग, तप, सत्य और करुणा को दैनिक आचरण में उतारने का अभ्यास कराती है। सादा आहार, सीमित आवश्यकताएँ और ब्रह्ममुहूर्त की साधना मन को विकारों से मुक्त करती है। उन्होंने कहा कि कल्पवास में जीवन को उपभोग नहीं, बल्कि साधना मानने का दर्शन निहित है, जो मनुष्य को आत्मबोध, सामाजिक समरसता और नैतिक जीवन की ओर उन्मुख करता है।

वरिष्ठ लेखक एवं आलोचक डॉ. रविनंदन सिंह ने कहा कि कल्पवास की सात्विक परंपरा ज्ञान, भक्ति और आस्था का समन्वय है। यह सत, रज और तम—तीनों गुणों को संतुलित करने की परंपरा है, जिसमें जीवन में रहते हुए मोक्ष की अनुभूति और वीतरागी बनने का भाव निहित है। उन्होंने इसे चिंतन, मनन और साधना की परंपरा बताते हुए कहा कि यह शरीर और मन के सम्यक योग, भक्तियोग, कर्मयोग और ज्ञानयोग का संतुलित स्वरूप है। इंद्रिय-निग्रह, आत्मबोध और आंतरिक यात्रा इस परंपरा के मूल तत्व हैं, जिनके पीछे भारतीय जीवन दर्शन और सांस्कृतिक दृष्टिकोण निहित है।

इसके बाद गुरुबाणी के अंतर्गत नव ज्योति सिंह (गुरुद्वारा सभा) द्वारा गुरु नानक देव जी की वाणी “एक ओंकार सतनाम करता पुरख…” का भावपूर्ण गायन प्रस्तुत किया गया। इस शबद के माध्यम से उन्होंने मानवता, सत्य, समरसता और ईश्वर की एकात्मकता का संदेश दिया। गुरुवाणी की मधुर प्रस्तुति से सभागार आध्यात्मिक भाव से सराबोर हो उठा कार्यक्रम का संचालन संजय पुरषार्थी ने किया तथा कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

इस अवसर पर मनमोहन सिंह “तन्हा”, अभिलाष नारायण, श्लेष गौतम, अजय मुखर्जी, योगेन्द्र मिश्रा, आभा मधुर सहित अनेक साहित्य प्रेमी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

AT Samachar
Author: AT Samachar

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