ये सिर्फ टूटती सड़कों की कहानी नहीं है… ये उस सिस्टम की चुप्पी की कहानी है जो जनता की चीख भी नहीं सुनता।

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तहजीब लियाकत की रिपोर्ट

प्रयागराज। नगर निगम की सीमित क्षमता और लचर योजनाओं का खामियाजा अब सीधे जनता को भुगतना पड़ रहा है। एक तरफ़ शहर की 100 साल पुरानी वॉटर पाइपलाइन अब अपनी उम्र पार कर चुकी है — दी गई उम्र पूरी होने के बाद वह गल चुकी है, जगह-जगह से लीक हो रही है, और इसी के साथ लोगों तक पहुंच रहा है प्रदूषित और अस्वच्छ जल।

स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी, नगर निगम की निष्क्रियता, और प्रशासनिक अनदेखी — इन सबके बीच पनप रही है एक भयावह स्थिति, जिसका प्रभाव आने वाले तीन वर्षों में बेहद गंभीर हो सकता है।

स्थानीय समाजसेवी और पूर्व पार्षद कमलेश सिंह ने बार-बार चेताया है “हमने निवेदन किया, पत्र लिखा, अधिकारियों को बताया… कि 100 किलोमीटर लंबी इस पाइपलाइन को किसी बड़ी योजना में बदलवाया जाए। अगर अभी नहीं चेते तो मानव स्वास्थ्य पर बड़ा खतरा मंडरा सकता है।” दूसरी ओर, 81 नाले शहर की नदियों को प्रतिदिन गंदगी और कचरे से भरते हैं।

इन नालों से बहकर जा रहा है सीवर, केमिकल और प्लास्टिक, जो नदियों के अस्तित्व को निगल रहा है। इस पर कोई ठोस योजना नहीं बनी, कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई। मामला एनजीटी तक गया, मुकदमा दर्ज हुआ — लेकिन परिणाम शून्य।

आज जब बाढ़ का पानी घटा, तो फिर बढ़ने की आशंका बनने लगी

बक्शीबांध का जलस्तर 81.20 तक पहुंच चुका है — हालात ऐसे हैं कि लोग मज़ाक में कह रहे हैं। “लगता है लेटे हुए हनुमान जी को फिर से स्नान कराना पड़ेगा।” लेकिन इस मज़ाक के पीछे छिपा है व्यवस्था पर गहरा व्यंग्य।

 

अब बात करते हैं एक छोटी सी गली की, जो आज पूरी कहानी की असलियत बयान करती है। अमिताभ बच्चन रोड पर कुछ दिन पहले हुई बारिश के बाद सीवर लाइन के लिए एक गली को खोदा गया लेकिन उसे दोबारा ठीक नहीं किया गया।

 

उसी गली से गुजर रही थी एक स्कूली बच्ची — साइकिल पर सवार, किताबों का बोझ और सपनों की उड़ान लिए। लेकिन अचानक कीचड़ में उसका संतुलन बिगड़ा, ब्रेक मारी — और वह फिसल कर गिर पड़ी।

चोट लगी। रोई नहीं, ड्रेस बदली… और फिर उसी रास्ते से स्कूल गई। यह केवल एक बच्ची की कहानी नहीं, यह कहानी है उस पीढ़ी की, जो व्यवस्था की लापरवाही में भी आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है।

सवाल है कब तक हम जर्जर पाइपलाइनों से प्रदूषित पानी पीते रहेंगे? कब तक 81 नालों से गंदगी बहाकर अपनी ही नदियों को मारते रहेंगे? और कब तक स्कूली बच्चों को गड्ढों में गिरकर उठना पड़ेगा, बिना किसी माफी या मुआवज़े के?

समय की मांग है — एक समग्र योजना, एक स्पष्ट निर्णय, और एक कर्तव्यनिष्ठ प्रशासन। अन्यथा आने वाले वर्षों में यही मुद्दे आपदा में बदल जाएंगे।

AT समाचार की ये विशेष रिपोर्ट आपको अगर ज़रूरी लगी हो, तो इसे शेयर करें — ताकि वो लोग जागें जिनके हाथ में योजनाएं हैं, और वो भी जो केवल वादे करते हैं।

AT Samachar
Author: AT Samachar

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