त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट
प्रयागराज। राष्ट्रीय शिल्प मेला: कवि सम्मेलन में ओज, व्यंग्य और संवेदना की बही रसधारा। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित राष्ट्रीय शिल्प मेला के मुक्ताकाशी मंच पर भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें साहित्य और कला का अद्भुत संयोग देखने को मिला।
ख्यातिलब्ध कवियों ने वीर रस, हास्य और व्यंग्य का ऐसा प्रभावशाली प्रवाह प्रस्तुत किया कि दर्शक लगातार तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गुंजाते रहे।कवियों ने समाज की विसंगतियों, राष्ट्रप्रेम और मानवीय संवेदनाओं को अपनी शक्तिशाली पंक्तियों में पिरोकर एक सशक्त संदेश दिया। प्रस्तुतियों के दौरान दर्शक कभी ठहाकों से फूट पड़े तो कभी संवेदनाओं से अभिभूत दिखाई दिए।कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि हर्षवर्धन वाजपेयी (विधायक, शहर उत्तरी प्रयागराज), मेजर जनरल कमांडेंट धर्मराज राय (प्रयागराज), वरिष्ठ रंगकर्मी अतुल यदुवंशी एवं वासुदेव भगत द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।
केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा ने सभी विशिष्ट अतिथियों को अंगवस्त्र एवं पौधा भेंट कर सम्मानित किया। स्वागत उद्धबोधन कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय ने किया। दिल्ली के कवि गजेन्द्र सोलंकी की वीर रस की रचना श्रोताओं तक पहुंची तो वह देशभक्ति के भाव से भर उठे। उन्होंने सुनाया आन बान शान और स्वाभिमान की मशाल, क्रांति चेतना की अंगड़ाई को नमन है। काल के कराल भाल जिससे तिलक किया,उस पुण्य लहू की ललाई को नमन है। विश्वगुरु के चरणों में सबको आना होगा क्योंकि, समस्याओं की दुनिया है, पर समाधान का भारत है।’ भारत के परिन्दों की जग में पहचान जिन्दा है, दिल में हिन्दुस्तान जिन्दा है। इस पर अभिभूत होकर श्रोता भारत माता की जय-जयकार करने लगे। इसके बाद कवि अज़हर इक़बाल ने अपनी शेर-ओ-शायरी से प्रेम और मानवीय रिश्तों की नज़ाकत को मुखर करते हुए कहा “बात बनाओ, बात बनाती अच्छी लगती हो,खाओ झूठी कसमें खाती अच्छी लगती हो…”उनकी इन पंक्तियों ने श्रोताओं को रोमांचित कर दिया।कवि नायाब बलियावी ने आर्थिक विषमता पर मार्मिक रचना प्रस्तुत की।
उन्होंने पढ़ा“ठंड जब जब भी पहाड़ों से उतर आती है, यही सच है कि गरीबों के घर में जाती है।” अशोक सिंह ‘बेशरम’ ने भारतीय संस्कृति की अमरता को स्वर दिया“बनारस की सुबह जिन्दा, अवध की शाम जिन्दा है, है संगम की रवानी और चारों धाम जिन्दा है…”श्लेश गौतम ने अपनी रचना के जरिए एकता और इंसानियत का संदेश दिया उन्होंने पढा “धर्म जाति भाषा मजहब की बातें बाद में,दिल में सबसे पहले हिंदुस्तान होना चाहिए।” ताजवर सुल्ताना ने ऊंचे-ऊंचे महलों की दास्तां ये कहती है। प्रीता वाजपेयी ने बेटियों के सशक्त भविष्य की सुंदर झांकी प्रस्तुत की उन्होंने “कन्धों पे आज चढ़ रहीं, प्यारी सी बेटियां।मंगल की ओर बढ़ रहीं, प्यारी सी बेटियां। इसके बाद बाराबंकी के हास्य कवि ओम शर्मा ओम ने अपनी रचनाओं की प्रस्तुति के विशेष अंदाज के लिए मशहूर इस कवि ने अपनी ख्याति के अनुसार ही अपनी रचनाओं से लोगों का खूब मनोरंजन किया। उन्होंने पढ़ा कैसे खुद को वो ढाल लेते हैं ,जिम से जां निकाल लेते हैं।बूढ़े मां-बाप को भगा करके, लोग कुत्तों को पाल लेते हैं और लगता है मेरे देश में इंसान नहीं हैं सुनाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। कवि शैलेन्द्र मधुर ने व्यवस्था पर तंज कसते हुए समाज की विडंबनाओं को बेहद पैनी शैली में व्यक्त किया“रेशमी हो गए लिवास यहाँ, लेकर बापू कपास बैठे हैं, आज लुटने से बच नहीं सकता, सब मेरे ख़ास-ख़ास बैठे हैं…”उनकी इन तीखी पंक्तियों ने सभागार में उपस्थित हर श्रोता को गहरी सोच में डुबो दिया।
कवि नजीब इलाहाबादी ने अपने छंदों के माध्यम से फर्ज़, आदर्श और इंसानियत की महत्ता को उठाते हुए कहा “अर्श वालों में ये चर्चा है कि क्या-क्या होगा,फ़र्ज़ का हुस्न ज़माने से निराला होगा…” इस अवसर पर काफी संख्या में दर्शक उपस्थित रहे।










