त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट
प्रयागराज। शहीदवॉल पर महेंद्र नाथ मुल्ला को किया गया नमन। आज प्रयागराज के लाल ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। शाम 4 बजे शहीदवॉल पर शहादत को सम्मान।
पुलिस बैण्ड ने शहीदवॉल पर राष्ट्रीय धुन बजाकर नमन किया
इस अवसर पर शहीदवॉल के संस्थापक वीरेन्द्र पाठक ने महेन्द्र नाथ मुल्ला की शहादत पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनके साथियों ने बताया कि
कैप्टन महेन्द्र नाथ मुल्ला महावीर चक्र विजेता-“जहाज के ब्रिज पर लगी कप्तान की कुर्सी पर वो शख्स शांत बैठे थे। बिना हड़बड़ी और घबराहट के जब तक जहाज दिखता रहा, हम उसकी ओर देखते रहे.” ये 45 साल पहले हुई उस जंग में जिंदा बचे एक नौसैनिक का बयान था, अपने जहाज के कप्तान को याद करते हुए। आज इसकी तारीखी प्रासंगिकता है, क्योंकि 9 दिसंबर 1971 को ही ये जहाज डूबा था. लेकिन ये कहानी सिर्फ एक जहाज के डूबने की नहीं है. ये कप्तान महेंद्रनाथ मुल्ला की चुनी हुई शहादत की कहानी है। उस रात भारतीय नौसेना के दो जहाजों- प्छै कृपाण और प्छै खुकरी को आदेश मिला कि पाकिस्तानी पनडुब्बी हंगोर को मार गिराया जाए. दोनों जहाजों के कमांडिंग अफसर महेंद्रनाथ मुल्ला खुद ब्रिटिश काल के ये दोनों जहाज फ्रांस से मंगाई गई ‘हंगोर’ सबमरीन के मुकाबले तकनीकी तौर पर बहुत पिछड़े थे। भारतीय नौसैनिक जानते थे कि मुकाबला बराबरी का नहीं है, पर जंग में नियम और शर्ते नहीं होतीं। शाम 7रू57 पर उसने प्छै कृपाण’ पर पहला टॉरपीडो फायर किया। कृपाण ने फटने से पहले ही उसको देखकर ऐंटी सबमरीन मोर्टार से उसे नष्ट कर दिया। टॉरपीडो फायर सीधे खुकरी के ऑयल टैंक में लगा. जहाज में तुरंत आग लग गई।
खुकरी को डूबता देख कैप्टन मुल्ला ने बिना किसी पैनिक के नौ-सैनिकों को जहाज छोड़ने का आदेश दिया. कप्तान ने अपनी लाइफ जैकेट भी किसी दूसरे नौ-सैनिक को दे दी और अपनी कुर्सी पर बैठे आदेश देते रहे। 176 नौ-सैनिक, भारतीय नौसेना के इकलौते डूबे जहाज से बच निकलने में नाकाम रहे और इनकी जिम्मेदारी लेते हुए कैप्टन महेंद्रनाथ मुल्ला ने भी जल समाधि ले ली। इलाहाबाद के इस कैप्टन को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। साथ ही नौसेना के प्लानिंग और ढांचे पर नए सिरे से विचार विमर्श शुरू हुआ। इनका परिवार इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़े रहने के कारण इलाहाबाद आया। आज भी इनके परिजन इलाहाबाद में रहते हैं।










