त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट
प्रयागराज। गंगा भारत को सांस्कृतिक सूत्र में बाँधने वाली चेतना- डॉ. संजीव कुमार। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सांस्कृतिक केंद्र परिसर में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी में शनिवार को गंगा-दर्शन पर विचार विमर्श हुआ। मुख्य वक्ता डॉ. संजीव कुमार (सहायक आचार्य, इलाहाबाद डिग्री कॉलेज) ने ‘गंगे तव दर्शनात् मुक्ति : एक समग्र दर्शन’ विषय पर कहा कि गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा है, जिसने देश को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया है।
उन्होंने कहा कि वेद–पुराणों में गंगा को तीर्थमयी कहा गया है तथा ऋग्वेद में भी इसका उल्लेख मिलता है। गंगा को मात्र जल का स्रोत नहीं, बल्कि देवी स्वरूप मानकर पूजा जाता है। हिंदू धर्म में अनेक धार्मिक अनुष्ठान बिना गंगाजल के पूर्ण नहीं माने जाते।
संगोष्ठी में विशिष्ट वक्ता डॉ. अलका प्रकाश (सहायक आचार्य, स्टेट यूनिवर्सिटी) ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गंगा आध्यात्मिक चेतना की प्रवहमान धारा है। “गंगे तव दर्शनात् मुक्ति” का आशय केवल स्नान नहीं, बल्कि चित्त-शुद्धि और आत्मबोध से है। वहीं “नमामि गंगे” अभियान इस सांस्कृतिक दर्शन को संरक्षण और उत्तरदायित्व से जोड़ता है।
इसी क्रम में ब्रह्मनाद कला महोत्सव के अंतर्गत आयोजित गायन प्रतियोगिता में 15 प्रतिभागियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम सलाहकार श्रीमती कल्पना सहाय ने प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित किया। गायन प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में मनोज गुप्ता एवं चित्रा चौरसिया शामिल रहीं।
कार्यक्रम के अंत में केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा ने आभार व्यक्त किया।










