त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट
प्रयागराज। विमर्श में पांडुलिपियों के संरक्षण और शोध पर प्रो. हरिदत्त शर्मा ने रखे विचार। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (एनसीजेडसीसी), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित विमर्श श्रृंखला के अंतर्गत शनिवार को केंद्र के बहुउद्देशीय हॉल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. हरिदत्त शर्मा मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में उन्होंने अपनी चर्चित पुस्तक काव्यचंद्रिका के शोध और प्रकाशन से जुड़े अनुभव साझा किए। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य वक्ता के साथ केन्द्र निदेशक सुदेश शर्मा, उपनिदेशक डॉ. मुकेश उपाध्याय एवं कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय ने दीप जलाकर किया।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1990 में इंडो-फ्रेंच कल्चरल एक्सचेंज कार्यक्रम के अंतर्गत फ्रांस यात्रा के दौरान उनकी इस दुर्लभ पांडुलिपि से जुड़ने की शुरुआत हुई। फ्रांस की राष्ट्रीय पुस्तकालय में सुरक्षित इस पांडुलिपि की खोज और उस पर शोध कार्य में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान प्रो. पियरे-सिल्वैं फिलियोज़ा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रो. शर्मा ने अपने व्याख्यान में भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक पहचान पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि उनकी शोध यात्रा जर्मनी से प्रारंभ हुई, जहाँ भारतीय साहित्य और संस्कृत ग्रंथों के प्रति विदेशों में गहरी रुचि देखने को मिली। इस दौरान उन्होंने महाकवि कालिदास द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञानशाकुंतलम् का उल्लेख करते हुए उसकी विश्वव्यापी लोकप्रियता पर चर्चा की। साथ ही, उन्होंने महान जर्मन विद्वान मैक्स मूलर के योगदान को याद करते हुए कहा कि विदेशी विद्वानों ने भारतीय संस्कृति और वेदों के अध्ययन को विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1987 में जर्मनी की यात्रा को याद करते हुए कहा कि जर्मनी में कालीदास मिल गए।
प्रो. शर्मा ने बताया कि काव्यचंद्रिका मूल रूप से बंगला लिपि में लिखी गई थी और इसके अलग-अलग अपूर्ण संस्करण विभिन्न देशों में सुरक्षित थे। पेरिस, लंदन और ऑक्सफोर्ड से प्राप्त पांडुलिपियों का अध्ययन कर अंतिम आलोचनात्मक संस्करण तैयार करना काफी चुनौतीपूर्ण रहा। डॉ. राम किशोर झा के सहयोग से इस ग्रंथ का देवनागरी लिप्यंतरण और संपादन संभव हो सका। उन्होंने अपनी पुस्तक काव्यचंद्रिका केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा को भेंट की तथा उसे “ज्ञानभारतम्” एप पर अपलोड भी कराया। इस अवसर पर उन्होंने युवा शोधार्थियों से भारतीय बौद्धिक धरोहर के संरक्षण और प्रकाशन के लिए आगे आने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में प्रो. शर्मा की उपलब्धियों का भी उल्लेख किया गया। उन्हें लसल्लतिका काव्य पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार (2007), आक्रन्दनम् नाटक पर दिल्ली संस्कृत अकादमी पुरस्कार (1998), प्रेसिडेंट्स सर्टिफिकेट ऑफ ऑनर (2015), सौहार्द सम्मान (2020) तथा संस्कृत प्रतिष्ठा सम्मान (2022) सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
प्रो. शर्मा को जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, जापान, कनाडा और मॉरिशस सहित 18 देशों का शैक्षिक अनुभव प्राप्त है। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय एवं विदेशों के विश्वविद्यालयों में 44 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा उनके निर्देशन में 29 शोधार्थियों ने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनकी 17 पुस्तकें और 85 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं।
ग्रीष्मकालीन कार्यशाला- भीषण गर्मी और हीट वेव को ध्यान में रखते हुए उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा आयोजित ग्रीष्मकालीन कार्यशाला के समय में परिवर्तन किया गया है। अब कार्यशाला प्रातः 7:30 बजे से 10:00 बजे तक आयोजित की जाएगी।










