त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट
प्रयागराज। भारत मे महिलाओं को शिक्षित करने का प्रथम संघर्ष ज्योतिबा फुले ने की। ज्योतिबा फुले महिलाओं व पिछडे और अछूतो के उत्थान के लिय अनवरत कार्य किए। वो समाज के सभी वर्गों को शिक्षा प्रदान करने के प्रबल समथर्क थे। वे भारतीय समाज में प्रचलित जाति पर आधारित विभाजन और भेदभाव के विरुद्ध थे। उनका मूल उद्देश्य स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार प्रदान करना, बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन करना रहा है उक्त बातें दौना में संचालित प्रबुद्ध पाठशाला के प्रबंधक उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आईपी रामबृज ने कही।
रामबृज ने पाठशाला के बच्चों को समझाते हुये बताया कि ज्योतिबा फुले की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जो कहते थे उसे अपने आचरण और व्यवहार में उतारकर दिखाते थे। इस दिशा में अग्रसर उनका पहला कदम था अपनी पत्नी सावित्री बाई को शिक्षित करना।ज्योतिबा फुले का कथन था कि जब ब्राह्मण समाज का विधुर दूसरी शादी कर सकता है तो उनकी विधवा बालिका या स्त्री दूसरी शादी क्यों नहीं कर सकती है। महिलाओं के साथ इस तरह के भेदभाव क्यों ? बाल विवाह के दुष्परिणामों को लेकर वो लोगों को जागरूक करते रहे। गरीबों और दलितों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा फुले आजीवन संघर्ष करते रहे। उन्होंने 1873 में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। सामाजिक न्याय के प्रति उनके संघर्ष को देखते हुए 1888 में उन्हें महात्मा की उपाधि दी गई। इन्हें महात्मा फुले एवं “जोतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है। इन्होंने अपना पूरा जीवन स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार दिलाने, बाल विवाह को बंद कराने में लगा दिया। फुले समाज की कुप्रथा, अंधश्रद्धा की जाल से समाज को मुक्त करना चाहते थे किन्तु 28 नवंबर, 1890 को 63 साल की उम्र में उनका निधन हुआ।










