भारतीय लोकसंस्कृति की आत्मा है माघ मेला- डॉ. पुष्पेंद्र प्रताप सिंह।

भारतीय लोकसंस्कृति की आत्मा है माघ मेला- डॉ. पुष्पेंद्र प्रताप सिंह।

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त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट 

प्रयागराज। भारतीय लोकसंस्कृति की आत्मा है माघ मेला- डॉ. पुष्पेंद्र प्रताप सिंह। गंगा–यमुना–सरस्वती के पावन संगम तट पर माघ मास में लगने वाला माघ मेला केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बोलियों, लोकगीतों, लोककथाओं और जनविश्वासों का एक विशाल सांस्कृतिक मंच भी है। अवधी, भोजपुरी, ब्रज और बुंदेली जैसी जनभाषाओं में माघ मेले का वर्णन सहज, भावुक और अत्यंत चित्रात्मक रूप में मिलता है। उक्त बातें उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित साहित्यिक-सांस्कृतिक संगोष्ठी में आयुर्वेदाचार्य डॉ. पुष्पेंद्र प्रताप सिंह ने व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि लोककथाओं में माघ मेला मोक्ष, तपस्या और चमत्कार का स्थल बनकर उभरता है। साधु-संतों की सिद्धियाँ, कल्पवासियों की कथाएँ और संगम-स्नान से जीवन-परिवर्तन की कहानियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोकमानस में प्रचलित हैं। वर्तमान समय में भले ही मेले का स्वरूप बदला हो, लेकिन आज भी लोग सुकून, शांति, आध्यात्मिक अनुभूति और दिव्य ऊर्जा की प्राप्ति के लिए संगम तट पर आते हैं।

इस अवसर पर साहित्यकार एवं इलाहाबाद डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विधि विभाग के सहायक आचार्य डॉ. श्लेष गौतम ने कहा कि तीर्थराज प्रयाग, जहाँ प्रतिवर्ष माघ मेला, छह वर्ष में अर्धकुंभ और बारह वर्ष में महाकुंभ का आयोजन होता है, का उल्लेख वेदों, पुराणों, उपनिषदों, रामायण, रामचरितमानस, महाभारत सहित लोकसाहित्य और अनेक जनभाषाओं में मिलता है। कार्यक्रम के अंतर्गत ब्रह्मनाद कला महोत्सव प्रतियोगिता भी आयोजित की गई, जिसमें गायन विधा में 10 एवं चित्रकला में 25 प्रतिभागियों ने अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में राज्य ललित कला अकादमी के सदस्य रविन्द्र कुशवाहा एवं वरिष्ठ चित्रकार डॉ. कावेरी विज शामिल रहे।

कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय ने सभी वक्ताओं को अंगवस्त्र एवं पौधा भेंट कर तथा प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रभाकर त्रिपाठी ने किया।

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Author: AT Samachar

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