पितृ पक्ष शुरू, पहले दिन पूर्णिमा का श्राद्ध, 15 दिनों तक इन बातों का रखें ध्यान, यह करना है वर्जित।

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21 सितंबर तक चलेगा, पितरों को खुश करने के लिए इन नियमों का करें पालन

प्रयागराज। आज 7 सितंबर से पितृपक्ष शुरू हो रहा है. पितरों के आवाहन के साथ ही 15 दिनों तक उनका पूरा ध्यान रखा जाता है. पहले दिन पूर्णिमा का श्राद्ध है। यह जानना आवश्यक है कि इन 15 दिनों तक किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, क्या करना चाहिए, जिससे पितर खुश हों और किन बातों से बचना चाहिए, जो आपको नुकसान की तरफ ले जाएं। यह भी जानिए कि किस तिथि को कौन सा श्राद्ध है और यह कितने प्रकार के हैं।

भाद्रपद की पूर्णिमा से पितृपक्ष की शुरुआत होती है. 21 सितंबर तक यह पर्व चलेगा। ब्रह्म पुराण के मुताबिक व्यक्ति को अपने पितरों की आराधना, श्राद्ध कर्म, तर्पण आवश्यक रूप से करना चाहिए, क्योंकि पितरों का भोजन-जल देने और पिंड के जरिए ही यह पूरा होता है। पितृपक्ष के दौरान 15 दिन तो श्राद्ध, तर्पण और जल देने की प्रक्रिया को नियमित रूप से पूरा किया जाना आवश्यक है।

वहीं ज्योतिषाचार्य विनय कुमार पांडेय बताते हैं कि सिंधु और भविष्य पुराण के मुताबिक श्राद्ध 12 प्रकार के माने गए हैं। इनमें नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, सपिण्डन, पार्वण, गोष्टी, शुद्धयर्थ, कमरार्ग, तीर्थ, यथार्थ और पुष्टयर्थ। इन अलग-अलग श्रद्धा कर्मों में अलग-अलग तरह के अनुष्ठान भी पूरे होते हैं। अलग-अलग दिन अलग-अलग श्रद्धा किए जाते हैं। लेकिन जिन लोगों की मृत्यु के दिन की सही जानकारी ना हो उनका श्राद्ध अमावस्या तिथि को करना चाहिए। किसी भी तरह की अकाल मृत्यु होने की स्थिति में भी श्राद्ध अमावस्या तिथि को किया जाता है।

पंडित ऋषि द्विवेदी का कहना है कि महालय या पितृपक्ष की शुरुआत भाद्र शुक्ल पूर्णिमा से ही हो जाती है। यह अश्विन अमावस्या तक रहती है, जिस दिन पूर्णिमा उदया तिथि में होती है, उस दिन महालय का आरंभ माना जाता है और उसी दिन से शुभ काम शुरू होते हैं, क्योंकि इस वर्ष उदया तिथि में पूर्णिमा 7 सितंबर को है। इसलिए महालय उसी दिन से प्रारंभ माना जाएगा। 6 सितंबर की आधी रात के बाद 12:57 पर पूर्णिमा लग जाएगी। जो कि 7 सितंबर की रात 11:45 तक रहेगी। श्राद्ध की पूर्णिमा 7 सितंबर को होगी। इसमें मातृ कुल के पितरों का श्राद्ध कार्यक्रम किया जाता है। प्रोफेसर विनय पांडेय का कहना है कि इस बार पंचमी और षष्टि का श्राद्ध 12 सितंबर को एक साथ होगा। मातृ नवमी 15 सितंबर को और संन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी 18 सितंबर को होगा। चतुर्दशी तिथि में 20 सितंबर को अकाल मृत्यु प्राप्त किए लोगों का श्राद्ध कर्म किया जाएगा।

श्राद्ध पक्ष के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं होता है

15 दिनों तक बिल्कुल सात्विक भोजन करना चाहिए प्याज लहसुन, मांस, मदिरा से पूरी तरह से दूरी बनाएं। घर में शांति व्यवस्था बनाए रखें किसी तरह का कलह-क्लेश ना हो इस बात का ध्यान रखें। लोहे के बर्तन में ना खाना पकाएं ना ही उसका इस्तेमाल करें। घर में घंटा-घड़ियाल या किसी भी तरह के बर्तनों को ना बजाएं।

पीतल, तांबा और अन्य धातु के बर्तनों का प्रयोग उत्तम माना गया है

बाल, दाढ़ी व नाखून नहीं कटवाने चाहिए यह पितरों को नाराज करते हैं.इन बातों का पालन करें। शाम के वक्त एक दीपक अपने घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण की तरफ जलाएं। प्रतिदिन खाना तैयार होने के बाद सबसे पहली रोटी गाय के लिए या किसी ब्राह्मण के लिए निकालें।

पितरों को संतुष्ट-खुश करने के लिए गायत्री मंत्र का जाप नियमित रूप से करें यदि आपने यज्ञोपवीत धारण किया है और गुरु मंत्र लिया है, तभी इसका पालन करें।

जिस भी तिथि पर जिस पूर्वज का दिन हो उसके नियमित यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन अवश्य कराए व दान करें।

यदि आप श्राद्ध कर्म या पिंडदान करने के लिए अपने घर से निकल कर काशी, मथुरा, अयोध्या, प्रयागराज या गया जा रहे हैं, तो संत स्वरूप ही धारण करें।

भगवा वस्त्र पहनकर प्रयागराज में अपना मुंडन करवाने के बाद काशी फिर गया या अयोध्या जहां आपकी परंपरा हो वहां अवश्य जाएं।

पितृपक्ष के दौरान सिर्फ गया में श्राद्ध, कर्म, आप तर्पण से पितरों को शांति नहीं मिलती

कहा गया है प्रयाग मुंडे, काशी पिंडे और गया दंडे, यानी प्रयागराज में मुंडन, काशी में पिंडदान और गया में पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध कर और तर्पण करना चाहिए।

ऐसी मान्यता है कि प्रयाग में विष्णु का स्थिर निवास, काशी में ढूंढी (विष्णु स्वरूप) और गया में चरण मौजूद है।

इसलिए हमेशा इन तीनों स्थान पर पितरों को संतुष्ट करने के लिए अनुष्ठान आवश्यक है सिर्फ एक स्थान गया में ही करना उचित नहीं है।

प्रयागराज में पिंडदान का महत्व

लोग पितरों के तर्पण के लिए गया धाम जाते हैं तो तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि पहला पिंडदान प्रयागराज में होता है। पितृ मुक्ति का प्रथम व मुख्य द्वार कहे जाने की वजह से संगम नगरी प्रयागराज में पिंडदान और श्राद्ध का विशेष महत्व है। यही वजह है कि पितृ पक्ष में बड़ी संख्या में श्रद्धालु संगम में आकर पुरखों का तर्पण और पिंडदान करते हैं।

AT Samachar
Author: AT Samachar

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