त्रिभुवन नाथ शर्मा की रिपोर्ट
प्रयागराज। “बंगाल में नाटक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोगों के जीवन का हिस्सा और सांस्कृतिक जुनून है” : प्रो. असीम मुखर्जी। “बंगाल में नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, समाज और जनजीवन का अभिन्न हिस्सा है। कोलकाता में आज भी 25 से अधिक सक्रिय रंगमंच हैं जहाँ प्रतिदिन नाट्य प्रस्तुतियाँ होती हैं और दर्शकों का उत्साह कलाकारों के समान ही दिखाई देता है।” यह विचार वरिष्ठ रंगकर्मी, शिक्षाविद एवं रंगचिंतक प्रो. असीम मुखर्जी ने व्यक्त किए। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित संवाद श्रृंखला ‘विमर्श’ में मुख्य वक्ता प्रो. असीम मुखर्जी, केंद्र उपनिदेशक डॉ. मुकेश उपाध्याय, श्री अजय मुखर्जी तथा सुश्री सुषमा शर्मा द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।
प्रो. मुखर्जी ने कहा कि बंगाल के रंगमंच की जड़ें दादा-दादी की लोककथाओं, ‘पोतो-शिल्पा’, कीर्तन और लोकनाट्य विधा ‘जात्रा’ में निहित हैं। उन्होंने बताया कि जात्रा मुक्त आकाश के नीचे प्रस्तुत किया जाने वाला ऐसा रंगमंच था जिसमें कलाकार बिना माइक के हजारों दर्शकों तक अपनी आवाज़ पहुँचाते थे। उन्होंने कहा कि भारतीय जन नाट्य संघ और ‘नील दर्पण’ जैसे नाटकों ने रंगमंच को सामाजिक परिवर्तन और जनजागरण का सशक्त माध्यम बनाया। इस दौरान उन्होंने उत्पल दत्त, शंभू मित्रा, सलील चौधरी तथा मूक अभिनय के महान कलाकार योगेश दत्ता के योगदान को भी रेखांकित किया।
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि ग्वालियर के 117 वर्ष पुराने बंगाली विद्यालय और कालीबाड़ी आज भी इस सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि तकनीकी बदलावों के बावजूद रंगमंच की प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं होगी क्योंकि कलाकार और दर्शक के बीच प्रत्यक्ष संवाद की शक्ति किसी अन्य माध्यम में संभव नहीं है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. मुकेश उपाध्याय ने प्रो. असीम मुखर्जी को अंगवस्त्र एवं पौधा भेंट कर सम्मानित किया।
इस अवसर पर कला, साहित्य एवं रंगमंच से जुड़े अनेक लोगों की उपस्थित रही।










